
प्रखर राष्ट्रवाद न्यूज:- कोरबासृजन ऊर्जा से उपन्यास विधा को स्पन्दित करने वाले भाषा-भूषण सम्मान से सम्मानित डॉ. दिनेश श्रीवास कोरबा, छत्तीसगढ़ में हिन्दी प्राध्यापक के पद को सुशोभित करते हुए पत्रकारिता विभाग के कर्मठ प्रभारी विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं। सारस्वत साधक श्री दिनेश श्रीवास द्वारा सृजित उपन्यास ‘माली ‘का मैने आद्यन्त दरस, परस, मज्जन एवं पान किया और दो निष्कर्ष निकाले – प्रथम तो यह कि जो अपने समय और समाज का सजग प्रहरी होगा तथा जिसमें समाज के सर्वांगीण विकास की जिजीविषा धड़कती होगी,वही ‘माली ‘जैसा उपन्यास लिख सकता है।तथा दूसरा जिसमें युगीन परिवेश का बोध होगा, वही हिन्दी वांग्मय को ‘माली’ जैसा उपन्यास दे सकता है। समाज के प्रति लेखक का अनुरागात्मक एवं संवेदनात्मक संबंध होता है। उसका जीवन भी सामाजिक अनुभवों के मध्य ही व्यतीत होता है। पात्र भले ही काल्पनिक हो किंतु उनकी कहानी युगीन यथार्थ का बोध कराने वाली ही होती है। समाज में ऊंच-नीच, जाति प्रथा भष्टाचार, बेरोजगारी की व्यथा-कथा एवं प्रशासनिक-राजनीतिक पहलुओं के नकारात्मक तथ्यों की काट-छांट एवं उन्हें सकारात्मकता से अभिमंडित करने हेतु लेखक को माली बनना ही पड़ता है। समाज में नारी के प्रति बदलते दृष्टिकोण को दुरदर्शी लेखक समझ रहा है, तभी तो ‘नारी अंगों का त्यौहार’ खंड में वह सचेत करता है। नारी को वस्तु समझने की मानसिकता का वह विरोध करता है। इस खंड में दिगंबर से रमणीक से कहता है-“तुम हँस रहे हो मुझ पर… कोई बात नहीं, लोग कई चीजों को सजावट और प्रदर्शनी के रूप में रखते हैं। बस ऐसा ही समझ लो, फिर आजकल लोग आर्ट के नाम पर स्त्रियों की अधनंगी तस्वीरें सजाकर रखते हैं।” नारी के प्रति आज समाज की सोच का यथार्थ मूल्यांकन उपन्यास लेखक दिनेश जी के विशेषता है। नारी जीवन की अन्तर्वेदना, शूल और उनकी टीस को व्यक्त करते हुए लिखा है -” …तुम्हारी बात भी सही है,पर संबंध जहाँ पर केवल ढोये जा रहे हो, वहाँ विचार अवश्य ही करना चाहिए। वैवाहिक संबंधों को जानबूझकर रौंदा जा रहा है। आजकल के समय में प्रेम बचा ही कहाँ है? है भी तो दूसरे रूप को धारण कर लेता है। इसके नाम से कई प्रकार के षडयंत्र किये जाते हैं” सामाजिक वैषम्य को ही अभिव्यक्त करते हुए लेखक आज के चिकित्सकों पर भी कैंची चलाता है। नैतिकता के नाम पर अनैतिक हाव-भाव प्रदर्शन एवं अतिरिक्त चिकित्सा (एक्सट्रा ट्रीटमेंट) के नाम पर अर्थार्जन सामाजिक वैषम्य का जीता जागता उदाहरण है ।

दिनेश श्रीवास ने लिखा है- ” डाक्टर खन्ना को मैं जानता हूँ। तनुजा उनके बाहरी दिखावे, उनके ग्लेमर और समाज में उनके प्रभाव से आकर्षित है। आकर्षण को ही वह प्रेम समझने की भूल कर रही है,किन्तु प्रेम और आकर्षण में बहुत अंतर होता है। वो शादीशुदा है और उसकी पत्नी ने तंग आकर सुसाइट कर लिया था” इसके अतिरिक्त उपन्यास लेखक ने समाज के कल्याणकारी स्वरूपों को जहाँ पानी देकर अभिसिंचित किया है,वहीं बाधक तत्वों को व्यंग्यात्मक शैली का उपयोग कर दण्डित भी किया है। आज के इस विषम समय में जब पाश्चात्य संस्कृति की सुरसा शाश्वत मूल्यों को निगलती जा रही है। संस्कृतियों की टकराहट में सजगता, सक्रियता एवं नैतिकता जब अपहृत होती जा रही है, ऐसे में समाज के सर्वांगीण विकास हेतु दिनेश श्रीवास का माली बनना तथा लिखना समाज के लिए अत्यन्त ही उपयोगी है। लेखक ने स्वप्न, पुराने बरगद की छाया में, फूल नहीं रंग बोलते हैं, सेकेन्ड सटरडे, शहर के भँवरे, सभ्यता का कचरा, रात के सन्नाटे में, जिरहवाले के दरवाजे पर जिरह, जमीन की कीमत, वापसी तथा न्याय के चौखट पर आदि शीर्षकों में युगीन संकटों के प्रति जन-जन को सचेत करने का जो बीड़ा उठाया है, वह वास्तव में स्तुत्य है। जहाँ तक शिल्प का प्रश्न है-भाषा किसी भी रचना का महत्वपूर्ण अवयव होता है क्योंकि रचनाकार का सम्पूर्ण रचनाकर्म भाषा के माध्यम से ही सम्भव हो पाता है। भाषा की ताकत ही अन्ततः रचना की ताकत होती हैं। इस दृष्टि से ‘माली’ की शब्द साधना हर वर्ग को अपनी लगेगी, ऐसा विश्वास है। यत्र-तत्र आँचलिक शब्दों का प्रयोग, संस्कृत एवं अंग्रेजी शब्दों का सफल एवं सटीक प्रयोग श्रीवास जी के कुशल शिल्प संयोजन का परिचय देता है। उपन्यास का मुखपृष्ठ इंद्रधनुषी भावों का आभास देने के का जीरण आकर्षक एवं शीर्षक के अनुकूल है। मैं उपन्यास एवं उपन्यासकार दोनों को अपनी अनंत मंगलकामनाएँ देती है।

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